शिवमहिम्न स्तोत्र | Shiv Mahimna Stotram/PDF


Shiv Mahimna Stotram, lord shiva



|| शिवमहिम्न स्तोत्र ||

शिवमहिम्न स्तोत्र (Shiv Mahimna Stotram) का तात्पर्य भगवान् शिव की महिमा से है | शिव भक्त गन्धर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित यह एक अत्यंत ही मनोहर शिव स्तोत्र है | शिवमहिम्न स्तोत्र से सम्बंधित एक अत्यंत रोचक कथा भी प्रचलित है | एकबार शिव भक्त राजा चित्ररथ ने अपने राज्य में अनेकों फूल से सुसज्जित उद्यान बनाया | प्रतिदिन शिव आराधना के पुष्प वहीँ से आते जिससे महाराज चित्ररथ शिव पूजन किया करते थे |


एकदिन गन्धर्वराज पुष्पदंत की निगाह उस उद्यान पर पड़ी जिसमें अनेको प्रकार के फूल खिले हुए थे |उन्होंने सोचा क्यों न इन फूलों के उपयोग शिव पूजन में किया जाय | अगले दिन प्रात: काल पुष्पदंत ने फूल बिल्पत्रादी सब तोड़ कर ले गए | जब माली ने उद्यान का हाल देखा तो खबर माहराज तक गई | उद्यान की सुरक्षा बढ़ा दिया गया, लेकिन फूल गायब होना बंद नहीं हुआ |
सारे प्रयत्न विफल हो गया लेकिन कोई पुष्पदंत को पकड़ नहीं पाया | सब समझ गए की यह कोई साधारण मनुष्य नहीं कोई मायावी है, जो प्रतिदिन फूल ले जाता है | अगले दिन रात्रि के समय प्रवेश द्वार पर निर्माल्य रख उसे कपडे से ढक दिया, प्रातः जब फूल तोड़ने के लिए पुष्पदंत उद्यान में आये तो उनके पैर निर्माल्य पर पड़ी जिसके प्रभाव से पुष्पदंत की सारी दैवीय शक्तियों का नाश हो गया |
पुष्पदंत को बहुत दुःख हुआ और उन्होंने उसी स्थान पर शिवलिंग का निर्माण कर विधिवत पूजन कर भगवान् भोलेनाथ को प्रसन्न करने हेतु शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ किया | भगवान् भोले शंकर ने शिवमहिम्न स्तोत्र से प्रसन्न हो पुष्पदंत को क्षमा दान दिया और बोले यह शिवमहिम्न स्तोत्र जिससे तुमने मेरी प्रार्थना की है, मुझे सदा प्रिय रहेगा एवं आगे जाकर यह शिवमहिम्न स्तोत्र के नाम से विख्यात होगा |

अथ शिवमहिम्न स्तोत्र:

महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी 
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः। 
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन् 

ममाप्येषस्तोत्रे हर! निरपवादः परिकरः।।१।।

अन्वयः- हर! यदि ते महिम्नः परं पारम् अविदुषः स्तुतिः असदशी, तद् ब्रह्मादीनाम् अपि गिरः त्वयि अवसन्नाः। अथ स्वमति परिणामावधि गृणन् सर्वः अवाच्यः, (अतः) मम अपि स्तोत्रे एष परिकरः निरपवादः। 


भावार्थः- हे हर! यदि आपकी अपार महिमा का पार न पाने वालों के द्वारा की गई आपकी स्तुति अनुचित है तो ब्रह्मादि की भी वाणी आपकी महिमा के वर्णन योग्य नहीं है, अत: अपनी अपनी मति के अनुसार आपका गुणगान करने वाले किसी को भी बुरा नहीं कहना चाहिए। इसलिए मैं भी आपकी स्तुति करने का प्रयास कर रहा हूँ।

O, Lord! if your praise by persons who do not know your full greatness be inappropriate than even Brahama and others cannot praise You. No one needs to be condemned for singing your praise according to the best of his capability, and thus I am making the present effort. 



अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो 
रतव्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि। 
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः

पदेत्वर्वाचीने पततिन मनःकस्य न वचः।।२।।

अन्वयः- तव महिमा च वाङ्मनसयोः पन्थानम् अतीतः।  यं श्रुतिः अपि अतद्-व्यावृत्त्या चकितम् अभिधत्ते, स कस्य स्तोतव्यः? कतिविधगुणः? कस्य विषयः? (तथापि) अर्वाचीने पदे कस्य मनः कस्य वचः (च)  न पतति।

भावार्थः- आप की महिमा वाणी और मन से परे है। वेद भी आश्चर्यचकित होकर 'नेति' 'नेति' कहते हैं, उसकी स्तुति कौन कर सकता है? उसके गुण कैसे हैं? वह कैसे समझा जा सकता है। (अर्थात् आपका वर्णन कोई नहीं कर सकता।) आपके नवीन साकार रूप में किसका मन नहीं आकृष्ट होता? किसकी वाणी आकृष्ट नहीं होती?

Your majesty transgresses the capacity of words and the mind. Even the Vedas, unable to describe that majesty in its fulness have exclaimed in awe- "Not only this", "Not only this". Who can praise such a one adequately? What are His attributes? How can He be grasped? Even so, every devotee does apply his mind and his words in singing praises of your numerous "Leelas”.


मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत 
स्तव ब्राह्मंकिम्वागपि सुर गुरोर्विस्मय पदम्। 
मम त्वेतां वाणी गुण कथन पुण्येन भवतः 

पुनामीत्यर्थेऽस्मिन्पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता
।।3।।

अन्वयः- हे ब्रह्मन्! परमम् अमृतम् मधुस्फीताः वाचः निर्मितवतः तव सुरगुरोः अपि वाक् किं विस्मयपदम्?  हे पुरमथन! मम तु एतां वाणी भवतः गुणकथनपुण्येन पुनामि इतिअर्थे अस्मिन् बुद्धिः व्यवसिता।

भावार्थः- हे ब्रह्मस्वरूप! आप अत्यन्त माधुर्ययुक्त अमृतरूपी वेदवाणी के निर्माता हैं! क्या आपको सुरगुरु बृहस्पति की भी वाणी विस्मित कर सकती है? हे पुरमथन, मैंने तो अपनी इस वाणी को आपके गुणकथन के पुण्य से पवित्र करने के लिए बुद्धि लगाई है।

O Lord, You are the Creator of honey-sweet words (viz. the “Vedas"). Your praise even by Brahma cannot astonish you. Therefore, O Lord, I am applying myself to your praise merely with a view to sanctify my tongue with a hymn to Your glory.


तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदय रक्षा प्रलयकृत् 
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं 
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः।।4।।

अन्वयः- हे वरद! जगदुदयरक्षाप्रलयकृत् त्रयीवस्तु गुणभिन्नासु तिसृषु तनुषु व्यस्तं यद् इह तव ऐश्वर्यं तद् विहन्तुम् एके जडधियः अस्मिन् अभव्या नांरमणीयाम् अरमणीं व्याक्रोशी विदधते।

भावार्थः- हे वर देने वाले प्रभो! सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व संहार करने वाला, वेदों द्वारा प्रतिपाद्य, सत्त्व-रजस् तम गुणों के भेद से ब्रह्मा-विष्णु-शंकर रूप तीन शरीरों में व्याप्त जो यह आपका ऐश्वर्य है, उसका खण्डन करने के लिए कुछ कुण्ठित बुद्धि के नास्तिक लोग आपके ऐश्वर्य के विषय में मन्दबुद्धि लोगों को प्रिय लगने वाले अनुचित शब्द-प्रयोग करते रहते हैं|

OLord, You are the Power which creates, sustains and dissolves the world, the Power described by the three Vedas with manifestations (Brahma, Vishnu, and Shiva) according to the three Gunas (Sattva, Rajas, Tamas). Nevertheless, many foolish persons try to belittle Your Majesty by using unpleasing language befitting only to unworthy persons.


किमीहःकिङ्कायःसखलु किमुपायस्त्रि भुवनम्
 किमाधारोधातासृजति किमुपादान इति च।
अतक्र्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः 
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः
।।5।।

अन्वयः- स धाता किमीह: किङ्कायः किमुपायः किमाधारः किमुपादानः च त्रिभुवनं सृजति इति अयं कुतर्कः अतक्र्यैश्वर्ये त्वयि अनवसरदुःस्थः खलु जगतः मोहाय कांश्चित् हतधियः मुखरयति।

भावार्थः- वह ब्रह्मा किस इच्छा के वशीभूत होकर किस शरीर से, किस विधि से, किस आधार में अधिष्ठित होकर व किस समवायिकारण से तीनों लोकों की उत्पत्ति करता है - इस प्रकार का कुतर्क कल्पनातीत ऐश्वर्य वाले आपके विषय में रहस्य न पाकर अस्थिर होते हुए भी संसार को भ्रम में डालने के लिए कुछ बुद्धिहीन लोगों को वाचाल बनाता है।

About you of unimaginable glory some other foolish persons are found creating confusion in the minds of men by elaborating You, with such inappropriate and ill-conceived arguments such as, "With what object, with what form with what means, on what basis and with what resources, does the great Lord create three World?"


अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगता
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
 अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो 
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे
।।6।।

अन्वयः- अमरवर!इमेलोकाःअवयववन्तः अपि किम् अजन्मानः? किम् भवविधिः जगताम् अधिष्ठातारम् अनादृत्य भवति? अनीशः वा कुर्यात् (तहि) भुवनजनने कः परिकरः? यतःमन्दाः (अतः) त्वां प्रति संशेरते।

भावार्थः- हे देवों में श्रेष्ठ! ये पृथ्वी आदि लोक अवयवी होने पर भी क्या जन्म-रहित हो सकते हैं? क्या सृष्टि की उत्पत्ति कर्ता के विना हो सकती है? ईश्वर से भिन्न यदि कोई मनुष्य, आदि इसका कर्ता है तो भू आदि लोगों की रचना करने के लिए उसके पास क्या सामग्री है? क्योंकि वे मन्दबुद्धि हैं इसलिए आपके विषय में संशय किया करते हैं।

O greatest of the shining ones, they do not comprehend that these Worlds cannot be birthless; that without a Creator the process of creation would be impossible, and that nobody other than the Almighty could take up the creation of all these Worlds: only the foolish harbor such doubts.


त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति 
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च। 

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषा 

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव
।।7।।

अन्वयः- त्रयी सांख्यम् योगः पशुपतिमतम् वैष्णवम्इति प्रभिन्ने प्रस्थाने इदम् परम् अदः पथ्यम् इति 
रुचीनाम् वैचित्र्याद् ऋजुकुटिलनानापथजुषाम् नृणाम् पयसाम् अर्णवः इवत्वम् एकः गम्यः असि।

भावार्थः- वेद, सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, शैवशास्त्र, वैष्णवशास्त्र इत्यादि विभिन्न मार्गों में "यह (हमारा) मत श्रेष्ठ है, वह (दूसरे का) मत श्रेष्ठ नहीं" इस प्रकार की रुचियों में भेद होने से सीधे-टेढ़े, अनेक मार्गों के अनुसार चलनेवाले मनुष्यों द्वारा प्राप्त करने योग्य वैसे ही आप एक हैं जैसे नदियों द्वारा प्राप्त करने योग्य समुद्र ।

The three Vedas and the various system of worship and philosophy, such as Sankhya, Yoga, Shaiva, and Vaishnava, point out "this is good", "that is beneficent" and so on.. You are the ultimate goal of all these devotees traveling by various paths, straight or crooked, in their varied ways, in the same manner as the Ocean is the goal of all channels of water, straight or meandering.

महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः

कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां 

न हि स्वात्माराम विषयमृगतृष्णा भ्रमयति
।।8।।

अन्वयः- वरद! महोक्षः, खट्वाङ्गम्, परशुः, अजिनम्, भस्म, फणिनः, कपालम् च इति इयत् तव तन्त्रो पकरणम्। सुराः तु ताम् ताम् ऋद्धिम् भवद्भूप्रणिहिताम् दधति। हि विषयमृगतृष्णा स्वात्मारामं न भ्रमयति।

भावार्थः- हे प्रभो! बैल, खाट का पाया, फरसा, मृगचर्म, भस्म, सर्प और खप्पर यही सब आपके व्यवहारोपयोगी साधन हैं। परन्तु (आप दाता हैं, अतः) देवता लोग भिन्न-भिन्न ऋद्धियों को आपकी कृपा कटाक्ष से धारण करते हैं। (आप स्वयं उपभोग नहीं करते) क्योंकि आत्मा में रमण करने वाले को सांसारिक विषयों की मृगतृष्णा भ्रम में नहीं डाल सकती ।

O granter of boons, Your equipment consists of several worthless items, such as the bull, the part of the cot, an axe, the deer-skin, ashes, the snakes, and the skulls; nevertheless, by a mere glance of grace from You the Shining Ones attain indescribable prosperity. The External Spirit surely is not deluded by the mirage of sense-objects.

ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं 

परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये। 
समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैर्विस्मित इव 

स्तुवजिह्वेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता
।।9।।

अन्वयः पुरमथन! कश्चिद् इदम् सर्वम् ध्रुवम् गदति, अपरः सकलम् अध्रुवम्। तु परः जगति व्यस्तविषये धौव्याध्रौव्ये एतस्मिन् समस्ते तैः विस्मित इव अपि त्वाम् स्तुवन् न जिहेमि। ननु मुखरता खलु धृष्टा।

भावार्थः- हे त्रिपुरासुर का विनाश करने वाले! कोई इस सम्पूर्ण जगत् को नित्य बताता है, अन्य कोई इसे अनित्य बताता है, तथा अन्य कोई जगत् में नित्य और अनित्य दोनों प्रकार के पदार्थ मानते हैं। ऐसा होने पर आश्चर्य में पड़ा हुआ सा भी आपकी स्तुति करता हुआ, मैं लज्जित नहीं हो रहा हूँ। वस्तुतः वाचालता ही ढीठ होती है।

O Destroyer of the Tripura, some say "All this is Eternal": others say "All this is Transient": still others say "This entire world consists of a fusion of the External and the Transient". While being confounded by such statements, I am not abashed in singing Your praise: indeed a singer has to leave off shyness.

तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरि विरञ्चिहरिरधः

परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः। 
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्

 स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति
।।10।।


अन्वयः, गिरिश! अनलस्कन्धवपुषः तव यद् ऐश्वर्यम् परिच्छेत्तुम् विरञ्चिः उपरि हरिः अधः यत्नाद् यातौ अनलम्, ततः भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृण द्भ्याम्ताभ्याम् तस्थे। तव अनुवृत्तिः किम् न फलति?

भावार्थः- हे कैलासवासी ! अग्निस्तम्भ के समान आपकी तेजोमयी मूर्ति का जो पार पाने के लिए ब्रह्माजी ऊपर की ओर, विष्णुजी नीचे की ओर प्रयत्नपूर्वक गये, वह पार न पा सके। बाद में भक्ति और श्रद्धा से अवनत होकर स्तुति करते हुए उन दोनों के समक्ष आप स्थिर हो गए। आपके अनुसरण से क्या फल नहीं मिलता ?

One who dwells on Mount Kailasa, What benefits are unattainable through devotion for You? Even Lord Brahma and Lord Vishnu who tried to measure the full glory of Your shining form could not succeed; but when they sang songs in Your praise with sincere love and devotion. You did appear in person before them. So, is there anything that is not possible through devotion to you?

अयत्नादापाद्य - त्रिभुवनमवैर - व्यतिकरं 

दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्। 
शिरः पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले: 

स्थिरायास्त्वद्भक्तस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्
।।11।।

अन्वयः - त्रिपुरहर!शिरःपद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलेः स्थिरायाः त्वद्भक्तेः इदम् विस्फूर्जितम् यद् दशास्यःत्रिभुवनम् अयत्नाद् अवैरव्यतिकरम्आपाधरणकण्डू परवशान् बाहून् अभृत।

भावार्थः- हे त्रिपुर-संहारक! अपने मस्तकरूपी कमलों की पंक्ति को आपके चरणकमलों में समर्पित करके की गई आपकी निश्चल भक्ति का यह प्रताप है कि दशग्रीव रावण ने तीनों लोकों को अनायास ही पूर्णतया निर्वैर बनाकर युद्ध के लिए खुजलाने वाली भुजाओं को धारण किया।

O destroyer of Tripura! Ravana, the ten-headed demon King, worshipped You by putting at Your lotus-feet the garland of his ten heads. This unflinching devotion made him unrivaled in all the Three World and his twenty arms continued to itch for a fight without an adversary to oppose him.


अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं 
बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
 अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितागुष्ठशिरसि 

प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः
।।12।।

अन्वयः -त्वदधिवसतौ कैलासे अपि बलात् विक्रमयतः अमुष्य त्वयि अलसचलिताङ्गष्ठ शिरसि पाताले अपि प्रतिष्ठा अलभ्या  आसीत्। उपचितः खलः ध्रुवम् मुह्यति।


भावार्थः- आपकी सेवा से प्राप्त शक्तिवाली अपनी भुजाओं से आपके निवासस्थान कैलासपर्वत पर भी हठपूर्वक पराक्रम दिखाने वाले उस रावण को आपके द्वारा अंगूठे के अग्रभाग से हल्का सा दबाये जाने पर पाताल में भी शरण नहीं मिली; क्योंकि समृद्धि प्राप्त करके दुष्ट अवश्य ही मोह में फंस जाता है।

The same Ravana, whose arms became so powerful because of his devotion for You, had the cheek to try to lift your abode (Kailasa); and then, with just a light shaking of the tip of your toe (denoting displeasure) he fell from this greatness so rapidly that he could not find a place even in the lowest abyss. Vicious people always fall into evil thoughts once they attain a high position.

यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद! परमोच्चैरपि

सतीमधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः । 
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोर्न 

कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः
।।13।।

अन्वयः - वरद! परिजनविधेयत्रिभुवनः बाणः सुत्राम्णः परमोच्चैः सतीम् अपि ऋद्धिम् यद् अधः चक्रे तत्त्व च्चरणयोः वरिवसितरि तस्मिन् न चित्रम् । त्वयि शिरसः अवनतिःकस्य अपि उन्नत्यै न भवति?

भावार्थः- हे वरद ! त्रिलोक को सेवक की तरह वश में रखने वाले बाणासुर ने इन्द्र की बहुत अधिक बढ़ी हुई सम्पत्ति को भी जो नीचा दिखा दिया, वह आपके चरणों में सिर झुकाने वाले उसके लिए आश्चर्य की बात नहीं थी। आपके आगे मस्तक को झुकाना किसकी उन्नति के लिए नहीं होता?

O Lord, Banasura could subjugate all the three worlds and excel even Indra's prosperity. This would be amazing, but for the fact that this was the fruit of his extreme devotion and surrender at Your feet. A sincere and low bow before You can lead to the highest pinnacle of prosperity.

अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा

विधेयस्याऽऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः। 
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो 

विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवनभयभङ्गव्यसनिनः
।।14।।


अन्वयः - कृपाविधेयस्य विषं संहृतवतः तव कण्ठे कल्माषः आसीद्। स तव श्रियम् न कुरुते इति न। अहो! भुवन भय भङ्गव्यसनिनः विकारः अपि श्लाघ्यः।

भावार्थः- हे त्र्यम्बक! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अचानक संहार से भयभीत हुए देव और दानवों पर दया के वशीभूत होकर विष का पान करने से आपका गला काला पड़ गया है। वह क्या आपकी शोभा को नहीं बढ़ाता है? अर्थात् बढ़ाता है। वस्तुतः ब्रह्माण्ड के भय को दूर करने में संलग्न सज्जन का विकार भी प्रशंसनीय होता है।

O three-eyed Lord, when poison came up through the churning of the ocean by the Gods and the Demons, they were all aghast with fear as if the untimely end of all creation was imminent. In Your kindness, You drank all poison which still makes Your throat blue. O Lord, even this blue mark does but increase Your glory. What is apparently a blemish becomes an ornament in One intent on ridding the world of all fear.

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे 

निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः। 
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत् स्मरः 

स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्यः परिभवः
।।15।।

अन्वय: ईश! जयिनः यस्य विशिखाः सदेवासुरनरे जगति क्वचिदपि नित्यम् असिद्धार्थाः न एव निवर्तन्ते, त्वाम् इतरसुरसाधारणम् पश्यन्स एवस्मरः स्मर्तव्यात्मा अभूत्। हि वशिषु परिभवः पथ्यः न (भवति)।


भावार्थः- हे महेश! सदा विजय प्राप्त करने वाले जिस कामदेव के तीखे बाण देव-असुर-मानव से परिपूर्ण जगत् में कहीं से भी सदा कार्य किए बिना नहीं लौटते, वह कामदेव आपको अन्य देवताओं की तरह साधारण देव समझता हुआ नाममात्र का हो गया, अर्थात् मारा गया। निश्चित है कि जितेन्द्रियों का अपमान कल्याणकारी नहीं होता ।

O Lord, Cupid is well-known for his shafts prevailing over the gods, the asuras and men alike, everywhere and at all times, but when he thought you were like an ordinary god, he was instantly reduced to ashes. Those who have power over their senses, never face defeat.

मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं 

पदं विष्णोर्धाम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्।
मुहुद्यौदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा 

जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता
।।16।।

अन्वयः- ननु त्वम् जगद्रक्षायै नटसि (तथापि) मही पादाघातात् सहसा संशयपदम् व्रजति, विष्णोः पदम् भ्राम्यद् भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्(व्रजति),अनिभृत जटाताडिततटाद्यौः मुहुः दौस्थ्यम् याति। विभुता ननु वामा एव।

भावार्थः- यद्यपि आप जगत् की रक्षा के लिए नृत्य (ताण्डव) करते हैं, तथापि पृथ्वी नृत्यकाल में होने वाले पाद के आघात से अचानक सन्देह को प्राप्त हो जाती है (कि नीचे न धंस जाऊँ), विष्णु भगवान् का पद अर्थात् आकाश घूमती हुई भुजाओं की चोट से इधर-उधर उछलते हुए ग्रहों वाला हो जाता है, खुली हुई जटाओं के झटके खाये हुए किनारों वाला स्वर्ग दुरवस्था को प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वैभव विपरीत ही हुआ करता है।

Even though You dance for the prosperity of the world, the entire earth trembles under the tread of Your footsteps, the star-bespangled sky is in turmoil due to the lashing of your arms and the movement of Your uncontrolled matted locks perturbs even the abode of gods. Indeed, the actions of the Great are incomprehensibly mysterious.

वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः

 प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते। 
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमित्य

नेनैवोन्नेयं धतमहिम दिव्यं तव वपुः
।।17।।

अन्वयः - वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः वारां यः प्रवाहः, ते शिरसि पृषतलघुदृष्टः, तेन जगद्जलधिवलयं द्वीपाकारं कृतम् इति अनेन एव तव दिव्यं वपुः धृतमहिम(इति) उन्नेयम्।

भावार्थः- पूरे आकाश में व्याप्त तथा तारागणों की चमक से बढ़ी हुई चमकवाली फेन से युक्त जल (आकाशगंगा) का जो प्रवाह आपके शिर में छोटी सी बूंद के समान दिखाई पड़ता है, उसी जलप्रवाह ने पृथ्वी को समुद्र से घेर कर द्वीप के आकार का बना दिया। इसी से ही आपका अलौकिक शरीर महिमा को धारण करने वाला है, यह सिद्ध है।

That Heaven-pervading stream (Ganga-the milky way), whose white foam gets added luster from the glimmering stars, becomes a small drop on Your matted locks. Yet, that stream has divided the World into seven Continents and has put a girdle of oceans around the earth. From this, one can easily guess how great Your divine glory is!

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो

 रथाङ्गे चन्द्राकौ रथचरणपाणिः शर इति। 
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि

विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः
।।18।।

अन्वयः- क्षोणी रथः, शतधृतिः यन्ता, अगेन्द्रो धनुः, चन्द्राका रथाङ्गे, अथो रथचरणपाणिः शरः इति त्रिपुरतृणं दिधक्षोः ते अयम् आडम्बरविधिः कः? खलु विधेयैः क्रीडन्त्यःप्रभुधियः परतन्त्राः न। 

भावार्थः- पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथि, सुमेरु पर्वत को धनुष, सूर्य व चन्द्रमा को रथ के दो पहिये तथा चक्रपाणि भगवान् विष्णु को बाण बनाकर तृण के समान त्रिपुरासुर को जलाने के इच्छुक आप शंकर की यह आडम्बर रचना किसलिए थी? वास्तविकता यह है कि अपने अधीन पदार्थों से (निष्प्रयोजन) खेलती हुई प्रभु की बुद्धियाँ पराधीन नहीं कही जा सकी ।

What paraphernalia did You employ in destroying the Demon Tripura whom You could effortlessly burn like a piece of grass-the earth was the chariot, Brahma the Charioteer, the Meru Mountain the bow, Lord Vishnu the arrow, and the Sun and the Moon the two wheels of the Chariot. Surely the Lord is all-powerful to do what He wills, yet he delights his devotees by such sport.

हरिस्ते साहस्रं कमलबलिमाधाय पदयो

र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा 

त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्
।।19।।

अन्वयः - हे त्रिपुरहर! हरिः ते पदयोः साहस्रं कमलबलिम् आधाय तस्मिन् एकोने निजम् नेत्रकमलम् यद् उदहरत् असौ भक्त्युद्रेक: चक्रवपुषा परिणतिं गतः त्रयाणां जगतांरक्षायै जागर्ति।

भावार्थः- हे त्रिपुरहर ! विष्णु भगवान् ने आपके चरणों में एक हजार कमलपुष्पों का उपहार भेंट करने का नियम बनाया और एक दिन उन कमलपुष्पों में से एक कम हो जाने पर अपने नेत्र कमल को निकालकर जो भेंट किया, वही भक्ति का आवेग सुदर्शनचक्र के रूप में परिवर्तित होकर तीनों लोकों की रक्षा के लिए सदा सावधान रहता है।

O destroyer of the 'Tripura' when Vishnu was offering You a Thousand lotus flowers and found just one flowerless, He pulled out His lotus eye to offer it at your feet. This devotion, since transformed into the divine disc called "Sudarshana" is ever awake to protect the World (from all evils).

क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां 

क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् 

श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः
।।20।।

अन्वयः - क्रतुमतां क्रतौ सुप्ते फलयोगे त्वं जाग्रत् असि। प्रध्वस्तं कर्म पुरुषाराधनम् ऋते क्व फलति? अतः त्वां क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं सम्प्रेक्ष्य जनः श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा कर्मसुदृढपरिकरः (भवति)।

भावार्थः- यज्ञादि कर्म करनेवालों के यज्ञादि क्रियाकलाप के नष्ट हो जाने पर भी फल देने के लिए आप जागते रहते हैं। नष्ट हुआ कर्म चेतनपुरुष (शिव) की आराधना के बिना क्या फल दे सकता है? अर्थात् नहीं दे सकता। भाव यह है कि कर्म स्वयं या उससे उत्पन्न जड़ अदृष्ट बिना चेतन के फल नहीं दे सकता। इसीलिए आपको यज्ञादि कर्म के फल देने का उत्तरदायी देखकर मनुष्य वेदों में श्रद्धा को दढ बनाकर कर्मों में दृढ़ता से तत्पर रहते हैं।

Sacrificial worship, like all actions, is instantly destroyed (according to Philosophers). Even so, You are ever awake to reward worshippers for it. Such worship can indeed bear no fruit, except when accompanied by devotion to the Lord. Finding You an alert and competent security for rewarding them, people engage themselves in such sacrifices, with full faith in Vedas.

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता -

मुषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफलविधानव्यसनिनो 

ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः
।।21।।

अन्वयः - हे शरणद! क्रियादक्षः तनुभृताम् अधीशः दक्षः क्रतुपतिः ऋषीणाम् आत्त्विज्यम् सुरगणाः सदस्याः, क्रतुफलविधानव्यसनिनः त्वत्तः क्रतुभ्रंशः (जातः) । ध्रुवम् हि कर्तुः श्रद्धाविधुरं मखाः अभिचाराय।

भावार्थः- हे शरणद ! जिस यज्ञ में कर्मकाण्ड में निपुण देहधारियों का स्वामी राजा दक्ष प्रजापति स्वयं यजमान था, त्रिकालदर्शी ऋषि ऋत्विज् थे और देवगण सदस्य थे, यज्ञादिकर्मों का फल देने के स्वभाव वाले आपके द्वारा वह यज्ञ विनष्ट हो गया। निश्चय ही, कर्ता की श्रद्धा के बिना किए गए यज्ञ विपरीत फल देते हैं।

O giver of refuge, Daksha Prajapati conducted that celebrated sacrifice in which he himself, an expert in these practices, was the worshipper; great sages were the priests and all the gods including Brahma were invitees. Nevertheless, it was destroyed by You, instead of rewarding the worshipper. Certainly, without real devotion, sacrifices can produce nothing but the destruction of the worshipper.

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं 

गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा। 
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुम् 

वसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मगव्याधरभसः
।।22।।

अन्वयः- हे नाथ! स्वां दुहितरं रोहिद्भूतां ऋष्यस्य वपुषा गतं प्रसभं रिरमयिषुम् अभिकं प्रजानाथं ते अपि धनुष्याणे: मृगव्याधरभसः सपत्राकृतम् दिवं यातं त्रसन्तम् अमुम् अद्य अपि न त्यजति।

भावार्थः- हे नाथ! अपनी पुत्री के मृगी बन जाने पर मृग का शरीर धारण कर बलपूर्वक उससे रमण करने की इच्छा वाले कामुक ब्रह्मा पर आपने धनुष धारण कर निपुण शिकारी की तरह अचूक बाण छोड़ा। मृगशिरा नक्षत्र बनकर आकाश में गये भयभीत ब्रह्मा को वह बाण आर्द्रा नक्षत्र बनकर आज भी नहीं छोड़ता।

O Lord, even today, the Star Hunter chasing the deer-constellation is in the sky due to Your ever-vigilant arrow chasing and afflicting, Brahma for his amorous designs on his daughter who assumed the form of a doe to escape him.

स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत् 

पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि। 
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत देहार्धघटना

दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः
।।23।।

अन्वयः- हे पुरमथन! हे यमनिरत! स्वलावण्या शंसाधतधनुषं पुष्पायुधं पुरः तृणवत् अह्नाय प्लुष्टं दृष्ट्वा अपि देवी देहार्धघटनाद् यदि त्वां स्त्रैणम् अवैति हे वरद! अद्धा।बत युवतयः मुग्धाः ।


भावार्थः- हे त्रिपुरमथन ! हे योगिन्! पार्वती के सौन्दर्य से आपको वश में करने की आशा से धनुष उठाये हुए कामदेव को अपने सामने तिनके की तरह तुरन्त जलता हुआ देखकर भी जगदम्बा पार्वती अर्द्धनारीश्वर रूप में धारण करने से यदि आपको स्त्री में आसक्त मानती हैं, तो हे वरद! यह ठीक है, क्योंकि युवतियाँ भोली होती हैं।

O destroyer of 'Tripura'! O self controller! having herself seen that Cupid, who had raised his shafts against You on the strength of her own physical charm, was destroyed instantaneously, Devi Parvati should not think that you are a slave to feminine grace, on seeing Your occasional half-female form. Alas! these young ladies are innocent.

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचरा

श्चिताभस्मालेपः स्रगपि न्रिकरोटीपरिकरः। 
अमाङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलम् 

तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मङ्गलमसि
।।24।।

अन्वयः - हे स्मरहर! श्मशानेषु आक्रीडा, पिशाचाः सहचराः, चिताभस्म आलेपः, अपि नृकरोटीपरिकरः स्त्रक्। एवं तव अखिलं शीलम् अमाङ्गल्यं नाम भवतु, तथापि हेवरद! स्मर्तृणां परमं मङ्गलम् असि।

भावार्थः- हे कामनाशक! श्मशानों में आपका विहार होता है, भूतप्रेत आपके साथी हैं, चिता की राख आपके शरीर का लेप है, और मनुष्यों की खोपड़ियों की माला पहनते हैं। हे वरद ! इस प्रकार आपके सारे आचरण अमाङ्गलिक होते हुए भी स्मरण करने वालों के लिए आप परम कल्याणकारी हैं।

O Destroyer of Cupid, Your actions seem inauspicious because you sport in the burning ghat, in the companionship of goblins, applying the ashes of funeral pyres on the body or putting on a garland of human skulls, etc. etc. but o lord, for those who remember You, You are the Highest Bliss.


मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः 
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्सङ्गितदशः। 

यदालोक्यालादं हद इव निमज्ज्यामृतमये 

दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान्
।।25।।

अन्वयः - यमिनः सविधम् आत्तमरुत: मनः प्रत्यचित्ते अवधाय यत् किम् अपि तत्त्वम् आलोक्य प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्सङ्गितदृशः अमृतमये हृदे निमज्ज्य इव अन्तः आह्लादं दधति तत् किल भवान्।

भावार्थः- योगिगण विधिपूर्वक प्राणायाम करते हुए मन को अन्तरात्मा में एकाग्र कर जिस किसी भी तत्त्व का दर्शन करके रोमाञ्चित व हर्षाश्रुपूरितनेत्रों वाले होकर अमृतमय सरोवर में निमग्न हुए से अपने अन्दर ही परमसुख को प्राप्त करते हैं, वह आप ही हैं।

When Yogis with self-restraint deliberately and systematically withdraw their sense from the sense-objects and look inward, they reach the stage of Samadhi (deep meditation) through various forms of breath-control, their hair standing erect and their eyes filled with joyous tears. You are that Bliss which they visualize with an indescribable thrill in their innermost heart as if they are immersed in nectar.

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह

स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं न 

विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि
 ।।26।।

अन्वयः - त्वम् अर्कः, त्वम् सोमः, त्वं पवनः, त्वम् हुतवहः, त्वम् आपः, त्वं व्योम, त्वम् धरणिः, त्वम् उ आत्मा च असि इति एवम् त्वयि परिच्छिन्नां गिरं परिणताः बिभ्रतु, वयम् तु इह तत् तत्त्वं न विद्मः यत् त्वम् न भवसि।

भावार्थः- आप सूर्य हैं, आप चन्द्रमा हैं, आप वायु हैं, आप अग्नि हैं, आप जल हैं, आप आकाश हैं, आप पृथ्वी हैं और आप ही आत्मा हैं - इस प्रकार विद्वान् लोग आपके बारे में सीमित वाणी बोलते रहें लेकिन हम जगत् में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जानते जो आप न हों। अर्थात् आप अपरिच्छिन्न हैं

The learned may use such diffused terminology in describing You, as You are the Sun, the Moon, Wind, Fire, or that You are the Sky, the Earth, or the Atman, etc. We, however, do not know of any element here which is not You.

त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा नकाराद्यैर्वर्णै स्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः 

समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमितिपदम्
।।27।।

अन्वयः - हे शरणद! त्रयीं, तिम्रो वृत्तीः, त्रिभुवनम् अथो, त्रीन् सुरान् अपि अकारद्यैः त्रिभिः वणः अभिदधत्,  (तथा च) तीर्णविकृति तुरीयंतेधाम अणुभिः ध्वनिभिः अवरुन्धानम् ओम् इति पदम् त्वां समस्तं व्यस्तं गृणाति।।

भावार्थः- हे शरणदाता ! तीनों वेदों (ऋक् यजुः, साम,) तीन अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति), तीनों भुवनों (भूः,भुवः, स्व:) और तीनों देवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) को अ-उ-म् इन तीन वर्षों से (सर्व विकारातीत अवस्थात्रय से परे) बोध कराने वाला 'ॐ' यह पद समस्त रूप में भी और व्यस्त रूप में भी आप ही को प्रतिपादित करता है।

O giver of refuge, the 'A-U-M' (ॐ) is a complete description of You in the integrated abstract form as well as in diversified forms. The three Vedas, the three attitudes, the three World, and the three Gods are all described by the three letters of the term 'A-U-M'. The same letter also describes Your fourth Transcendental Form. i.e. Eternal Consciousness

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां

स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्। 
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देव! श्रुतिरपि 

प्रियायास्मै धाम्ने प्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते
।।28।।

अन्वयः - हे देव! भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिः उग्रः सहमहान् तथा भीमेशानौ इति इदम् यद् अभिधानाष्टकम् अमुष्मिन् प्रत्येकम् श्रुतिः अपि प्रविचरति अथ अस्मै प्रियाय धाम्ने भवते प्रणिहितनमस्यः अस्मि।

भावार्थः- हे देव! भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम तथा ईशान ये जो आपके आठ नाम हैं, उनमें से एक-एक का क्रमशः वेदशास्त्र भी (स्मृति, पुराण, आदि तो करते ही हैं) विशेष बोध कराते हैं। उस परमानन्दस्वरूप स्वप्रकाशस्वरूप आपको विधिपूर्वक नमस्कार करता हूँ।

O Lord, You are denoted by eight separate names, viz. Bhava, Sarva, Rudra, Pashupati, Ugra, Mahadeva, Bheema, and Ishan. The Vedas attempt to explain each name. I can only offer my humble salutations to You who are the Selfillumined Eternal Consciousness and the Resort of all devotees.

नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो 

नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो

 नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः
।।29।।

अन्वयः - हे प्रियदव! नेदिष्ठाय दविष्ठाय च (ते) नमो नमः। हे स्मरहर! क्षोदिष्ठाय महिष्ठाय च (ते) नमो नमः। हे त्रिनयन! वर्षिष्ठाय यविष्ठाय च (ते) नमो नमः । सर्वस्मै तदिदमिति शर्वाय च ते नमो नमः।

भावार्थः- हे वनों से प्रेम करने वाले समीपातिसमीप और दूरातिदूर आपको बारम्बार नमस्कार है। हे कामान्तक ! सूक्ष्मातिसूक्ष्म और महत्तम आपको बारम्बार नमस्कार है। हे त्रिनेत्र ! वृद्धातिवृद्ध और युवकातियुवक आपको बारम्बार नमस्कार है। हे सर्वरूप! अखिल जगत् के अधिष्ठान आपको बारम्बार नमस्कार है।

O Lover of lonely forests, I bow down to you as a Presence that is the Farthest as well as the Nearest, the Smallest as well as the Greatest, the Oldest as well as the Youngest: indeed I bow down to one that can be described only as All.

बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः

प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः। 
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः 

प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः
।।30।।

अन्वयः - विश्वोत्पतौ बहुलरजसे भवाय नमो नमः। तत्संहारे प्रबलतमसे हराय नमो नमः। जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः। प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्येशिवाय नमो नमः।

भावार्थः- सृष्टि की उत्पत्ति के लिए रजोगुण-प्रधान ब्रह्मारूप आपको बारम्बार नमस्कार है। सृष्टि का संहार करने के लिए तमोगुणप्रधान रुद्ररूप आपको बारम्बार नमस्कार है। लोगों को सुख देने के लिए सत्त्व प्रधान सुखमय आप को बारम्बार नमस्कार है। मायारहित ज्योतिर्मय त्रिगुणातीत मोक्षपद की प्राप्ति के लिए कल्याणरूप आपको बारम्बार नमस्कार है।

You assumed the form of Brahma with the predominance of "Rajoguna" for creation: the form of Rudra with the dominance of "Tamoguna" for its destruction: and the form of Vishnu with a predominance of “Satvaguna" for its happiness. But, for salvation and elevation above the three Gunas and beyond the reach of Maya, is the resplendent form of Shiva: I offer my obeisance and seek refuge in You.

कृशपरिणति चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं 

क्व च तव गुणसीमोल्लङ्खिनी शश्वदृद्धिः। 
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधा

द्वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम्
।।31।।

अन्वयः - हे वरद! कृशपरिणति क्लेशवश्यम् इदं चेतः च क गुणसीमोल्लङ्घिनी शश्वत् तव ऋद्धिः च क इति चकितं माम् अमन्दीकृत्य भक्तिः ते चरणयोः वाक्यपुष्पोपहारम् आधात्।

भावार्थः- हे वरद ! अल्प परिणाम वाला क्लेशों के अधीन यह मेरा चित्त कहाँ और गुणों की सीमा से अधिक तथा नित्य आपकी विभूति कहाँ, इस प्रकार आश्चर्य में पड़े (असमर्थ) मुझको योग्य बनाकर आपके चरणों की भक्ति ने, आपके चरणों में वाक्यरूपपुष्पों की भेंट अर्पित कराई

O giver of all boons, on the one hand, is my mind, immature and afflicted, on the other is Your Eternal Indescribable Glory. Amazed and puzzled I have been impelled by my devotion to present these verbal flowers in the form of this hymn) at Your feet.

असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे 

सुरतरु-वर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं

 तदपि तव गुणानामीश पारं न याति
।।32।।

अन्वयः - हे ईश! यदि सिन्धुपात्रे असितगिरिसमं कज्जलम् सुरतरुवरशाखा लेखनी उर्वी (च) पत्रम् स्यात् (तथा) शारदा गृहीत्वा सर्वकालं लिखति, तद् अपि तव गुणानां पारं न याति।

भावार्थः- हे प्रभो! यदि समुद्ररूप दवात में काला पर्वत स्याही बने, कल्पवृक्ष की मोटी-मोटी शाखाएँ कलम बनें और पृथ्वी कागज बने तथा साक्षात् सरस्वती इन सबको लेकर निरन्तर लिखती रहें तो भी आपके गुणों का पार नहीं पाया जा सकता।

If the Goddess of learning herself were to write about Your glory on the vast earth with a pen prepared from the "Kalpa-Taru" and using the ocean as an ink-pot with mountains of ink-powder till the end of time, she will still not succeed in describing Your glory fully.

असुर-सुर-मुनीन्द्ररर्चितस्येन्दुमौले

ग्रंथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य। 
सकलगणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो 

रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार
।।33।।

अन्वयः - असुरसुरमुनीन्द्रः अर्चितस्य इन्दुमौलेः ग्रथितगुणमहिम्नः निर्गुणस्य ईश्वरस्य एतद् रुचिरं स्तोत्रम् पुष्पदन्ताभिधानःसकलगणवरिष्ठः अलघुवृत्तैः चकार।

भावार्थः- राक्षसों, देवताओं व मुनीन्द्रों द्वारा पूजित, मस्तक पर चन्द्रमा धारण किये हुए, गुणगणमहिमा से युक्त, निर्गुण आप महादेव भगवान् का यह मनोहारी स्तोत्र पुष्पदन्तनामक सर्व-गन्धर्वगणोंमें श्रेष्ठ गन्धर्वराज ने बड़े श्लोकों से किया।

The foremost of the Gandharvas named Pushpadanta has composed these longish and majestic verses in praise of Lord Shiva who is worshipped alike by the demons, the Gods, and sages of repute, although the Lord is 'Nirguna' (i.e. without any attributes.)

अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत् 

पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः । 
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र

 प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च
।।34।।

अन्वयः- शुद्धचित्तः यः पुमान् धूर्जटे: अनवद्यम् एतत्स्तोत्रम् अहः अहः परमभक्त्या पठति स अत्र प्रचुरतर धनायुः पुत्रवान् कीर्त्तिमान् च भवति तथा शिवलोके रुद्रतुल्यः (भवति)।


भावार्थः- पवित्र हृदयवाला जो मनुष्य जटाधारी शिव के परम-पवित्र इस स्तोत्र को प्रतिदिन परमभक्तिपूर्वक पढ़ता है, वह इस लोक में अत्यधिक धन आयुवाला, पुत्रों वाला व यशस्वी होता है तथा शिवलोक में शिव के समान होता है।

Whoever recites this sacred hymn everyday with sincerity and devotion reaches the Shivaloka after death and becomes equal to Lord Shiva himself. Here, in his life, he gets prosperity, Long life, progeny, and glory.

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः । 

अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्
।।35।।

अन्वयः- महेशाद् अपरः देवः न (अस्ति), महिम्न: अपरा स्तुतिः न (अस्ति), अघोराद् अपरः मन्त्रः न (अस्ति)  गुरोः परम् तत्त्वं न अस्ति।

भावार्थः- महेश्वर से बढ़कर और कोई देवता नहीं है, महिम्न से बढ़कर और कोई स्तुति नहीं है, अघोर मन्त्र से बढ़कर और कोई मन्त्र नहीं है, गुरु से बढ़कर और कोई तत्त्व नहीं है।

There is no God mightier than Lord Shiva, nor is there any hymn holier than this "Mahimna-stotra", there is no 'mantra' more powerful than the 'Aghoramantra', nor is any truth superior to the preceptor.

दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः। 

महिम्नः स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्
।।36।।

अन्वयः- दीक्षा दानं तपः तीर्थम् ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः महिम्नः स्तवपाठस्य षोडशी कलां न अर्हन्ति।

भावार्थः- दीक्षा लेना, दान, तप, तीर्थ, ज्ञान, तथा यज्ञ आदि क्रियाएँ 'महिम्नः स्तोत्र' के पाठ की सोलही कला के भी बराबर नहीं हैं।

Consecrations, charities, penances, pilgrimages, attainment of knowledge, and sacrificial offerings - none of these pieties can equal even a sixteenth portion of the merit earned by reciting this hymn.

कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः

शिशुशशधरमौलेर्देवदेवस्य दासः। 
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषा

त्स्तवनमिदमकार्षी हिव्यदिव्यं महिम्नः
।।37।।

अन्वयः - शिशुशशधरमौलेः देवदेवस्य दासः कुसुम दशननामा सर्वगन्धर्वराजः अस्य रोषात् खलु निजमहिम्नः भ्रष्टः सएव महिम्नः इदं दिव्यदिव्यं स्तवनम् अकार्षीत्।


भावार्थः- मस्तक पर बाल चन्द्रमा को धारण करने वाले देवों के देव शङ्कर का एक भक्त पुष्पदन्त नाम वाला गन्धर्यों का राजा था, वह इन्हीं शङ्कर जी के क्रोध से ही अपनी महिमा से गिर गया। फिर अपने दिव्य पद की प्राप्ति के लिए उसने ही, शिव भगवान् की महिमा के इस परमदिव्य स्तोत्र की रचना की।

The Gandharva-king named Pushpadanta, a servant of the great Lord Shiva, who bears the crescent moon on his head had once fallen from his greatness having incurred the Lord's displeasure. He then composed this sublime tribute to the glory of the Lord (to regain his lost status).

सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं 

पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः। 
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः

 स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्
।। 38 ।।

अन्वयः पुष्पदन्तप्रणीतम् अमोघम् सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम् इदं स्तवनम् यदि मनुष्यः प्राञ्जलिः नान्यचेताः पठति, किन्नरैः स्तूयमानः शिवसमीपं व्रजति।


भावार्थः- पुष्पदन्त द्वारा बनाये हुए, निष्फल न होने वाले, बड़े-बडे देवताओं और मुनियों द्वारा पूजनीय, स्वर्ग और मोक्ष के एक मात्र उपाय इस स्तोत्र को यदि मनुष्य हाथ जोड़कर तथा एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है तो वह किन्नरों द्वारा प्रशंसा प्राप्त करता हुआ शिव जी के पास जाता है।

This hymn is praised by gods and sages alike as He is the only means of attaining heavenly salvation. If a person recites it in all humility and with a concentrated mind, he attains the vicinity of Lord Shiva while kinnaras singing in his praise. This hymn composed by Pushpadanta is unfailing.

श्रीपुष्पदन्त - मुखपङ्कज-निर्गतेन 

स्तोत्रेण किल्विषहरेण हरप्रियेण। 
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन 

सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः
।।39।।

अन्वयः - श्रीपुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन किल्विषहरेण हरप्रियेण स्तोत्रेण कण्ठस्थितेन समाहितेन पठितेन भूतपतिः महेशः सुप्रीणितः भवति।

भावार्थः- श्रीपुष्पदन्त के मुखकमल से निकले हुए निखिल पापों का नाश करने वाले शिवजी के प्रिय इस स्तोत्र को कण्ठस्थ कर एकाग्रचित्त हो पाठ करने से भूतनाथ महेशजी अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।

This hymn sung by Shri Pushpadanta removes all evil propensities and is dear to the Lord. Whoever learns it by heart and recites it carefully is endeared to the Lord of all creatures.

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्करपादयोः। 

अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः
।।40।।

अन्वयः- इति एषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्ककरपादयोः अर्पिता, तेन सदाशिवः देवेशः मे प्रीयताम्।

भावार्थः- यह शब्दमयी पूजा श्री शङ्कर भगवान् के चरणों में समर्पित है। इससे सदा कल्याण करने वाले महादेव मुझ पर प्रसन्न हों।

This poetic tribute is dedicated to the feet of the great Lord. May He be pleased with me!

(इति शिवमहिम्न स्तोत्र)
shiv mahimna stotram

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