सत्यनारायण कथा तीसरा अध्याय - Chapter Third Satyanarayan Katha In Hindi

 

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सत्यनारायण कथा तृतीयोऽध्यायः  

सूतजी ने कहा- हे श्रेष्ठ मुनिगण ! अब आगे की कथा कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनिये । प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यव्रती था और सत्यव्रत के प्रचारार्थ सार्वजनिक आयोजन किया करता था। 

भद्रशीला नदी के तट पर एक ऐसे ही आयोजन में साधु नामक व्यापारी भी सम्मिलित हुआ और उस आयोजन से प्रभावित होकर राजा से व्रत के सम्बन्ध में विशेष जानकारी मांगी। 

राजा बोले - वैश्य का धर्म समाज की आवश्यकतानुसार शुद्ध वस्तुओं के उत्पादन और उनके उचित मूल्य पर वितरण की व्यवस्था करना है।

उदाहरण-

उत्पादन का अर्थ है- कम उपयोगी को अधिक उपयोगी बनाना । उत्पादन खेतों और कारखानों में होता है, दुकानों में तो वितरण होता है। बीज एक से अनेक होते हैं, सामान्य धातु को कीमती उपकरण बनाना भी उत्पादन है। लोगों में उत्पादन की क्षमता होने से समृद्धि रहती है।

उदाहरणार्थ-
 
१- गाय घास खाकर दूध देती है। उसमें उत्पादन की क्षमता होने से ही उसे उपयोगी एवं पूजनीय माना जाता है। 

२- बीज स्वयं को गलाकर अनेक दानों में बदल देता है। जो अपने स्वरूप का मोह करते हैं, वे उत्पादक सिद्ध नहीं हो पाते। 



वितरण का अर्थ है - जहाँ उत्पादन है, वहाँ से लेकर जहाँ आवश्यकता है, वहाँ वस्तु को पहुँचाना । संसार में आवश्यकता के अनुसार वस्तुएँ तो हैं, पर वितरण व्यवस्था ठीक न होने से ही कहीं अपव्यय और कहीं अभाव की स्थिति पैदा हो जाती है। 

उदाहरण:-

१- शिष्य ने प्रश्न किया "शरीर में पेट को वैश्य की संज्ञा क्यों दी गयी?" गुरु ने समाधान किया, शरीर को पोषण की आवश्यकता होती है। पोषण खाद्य पदार्थों से प्राप्त होता है; परन्तु उस रूप में शरीर के हर अंग में वह पहुँच नहीं सकते, पेट उन्हें पचाकर रस का उत्पादन करता है तथा आवश्कतानुसार शरीर के सभी भागों में भेज देता है। स्वयं भी आवश्यकता के अनुपात से ही रस लेता है, अधिक रस नहीं लेता । समाज में वैश्य का भी यही कर्म है। 

२- पृथ्वी पर भयंकर सूखा पड़ गया । वायुदेव ब्रह्मा से बोले- प्रभु आपने पृथ्वी से पानी क्यों हटा लिया ? ब्रह्मा ने कहा "वत्स" पृथ्वी पर जल अभी भी उतना ही है। समुद में तथा पहाड़ों पर, झीलों और हिम रूप में जमा है। पृथ्वीवासियों ने प्रकृति का सन्तुलन बिगाड़ दिया। अत: वितरण व्यवस्था बिगड़ गयी है । तुम मदद करो, बादलों को जल देकर अपने साथ आवश्यकता के स्थानों तक पहुँचाकर बरसाओ, जल की कमी नहीं पड़ेगी। 

३- भेड़ की ऊन कट गयी, रीछ हँसा बोला-"पगली अब सर्दियों में ठण्डक से मरेगी।"भेड़ बोली चिन्ता मत करो भैया, मैं तो भगवान की दी सम्पदा के वितरण में विश्वास करती हूँ। सर्दियों तक मुझे तो पुन: ऊन मिल जायेगी, पर तुम्हें मनुष्य का प्यार और सम्मान कभी नहीं मिल सकेगा। 

४- पहाड़ से नदी बह उठी, शिलायें बोली, आगे मत जा कच्ची धरती में सूखकर तेरा अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा, पर वह शान्त भाव से बढ़ती चली गयी, उसे तो प्यासों तक जल पहुँचाना था। वह सूखी नहीं, एक-एक करके धारायें मिलती गयीं और वह विशाल होती चली गयी। वितरण से वह बढ़ी, घटी नहीं। 

सत्य धर्म पालन करने वाला वैश्य अपनी तथा समाज की सम्पन्नता एवं सुख-शान्ति बढ़ाते हुए जीवन में प्रचुर यश का भागीदार बनता है। व्रत की प्रेरणा पाकर और विधि-विधान समझकर वैश्य अपने घर पहुँचा।

उस वैश्य ने अपनी पत्नी लीलावती को सारा वृतान्त सुनाया और वह भी सत्य धर्म का पालन श्रद्धापूर्वक करने लगी। 
पत्नी को पति द्वारा किये जाने वाले अच्छे कार्यों में श्रद्धा और प्रसन्नतापूर्वक सहयोग करना चाहिये । 

उदाहरण:
 
१- भगवान राम ने देवताओं के कार्य के लिए वन जाना स्वीकार किया। सीता ने भी उनका साथ दिया। राज्य सुख त्याग कर वन में संकट प्रसन्नता से स्वीकार किये। 

२- पण्डित वाचस्पति मिश्र वेदान्त शास्त्र पर दुर्लभ ग्रन्थ लिख रहे थे। कार्य में इतने तल्लीन थे कि अपने शरीर तथा आस-पास की सुधि भी नहीं थी। उनकी पत्नी वर्षों तक चुपचाप उनके लिये समय पर भोजन, वस्त्र,प्रकाश आदि की व्यवस्था करती रहीं। 

लोगों ने कहा-"तुम्हें इस प्रकार कष्ट सहने की आवश्यकता नहीं। पण्डित से कहो कि गृहस्थ के कर्तव्य पूरे करें और तुम्हारी देखभाल करें।" 

पत्नी ने उत्तर दिया “वे तो सारे समाज के लिये अद्भुत अनुदान दे रहे हैं। अपने स्वार्थवश थोड़े ही बैठे हैं। अर्धागिनी के नाते उनका आधा काम मुझे भी करना चाहिये। उतनी मेरी योग्यता नहीं, पर उनके कार्य में विघ्न न डालूँ, छोटी-छोटी सहायता करती रहूँ, इसी में मेरे जीवन की सार्थकता है । ग्रन्थ पूरा होने पर, पण्डित वाचस्पति ने उसका नाम पत्नी के नाम पर भामती' ही रखा।

३- याज्ञवल्क्य ऋषि संन्यास की तैयारी करने लगे। पत्नियों से कहा कि अपनी आवश्यकता बता दें, ताकि उसकी पूर्ति करके वे मुक्त हों। मैत्रेयी ने कहा आप जिस महान् उद्देश्य के लिये यह सब छोड़ रहे हैं, उस के लिये मैं भी आपका सहयोग करूँगी, मुझे कुछ नहीं चाहिये और वे ऋषि के साथ ही हो ली। 

४- अत्रि ऋषि चित्रकूट क्षेत्र में तप तथा सेवा-साधना में संलग्न थे। वहाँ पानी की कमी पड़ जाया करती थी। उनकी पत्नी अनुसूया ने आवश्यकता समझी और प्रचण्ड तप द्वारा गंगाजी को प्रसन्न कर लिया। फलस्वरूप मंदाकिनी की धारा वहाँ बह उठी । ऋषि का कार्य सुगमता से चलने लगा। 

सत्यव्रती वैश्य धर्मपत्नी का ज्ञान और योग्यता भी बढ़ाने लगा। फलस्वरूप उसके घर में व्यवस्था - सम्पन्नता तेजी से बढ़ने लगी। उन दोनों ने अपनी आय का एक अंश सत् कार्यों में नियमित रूप से लगाते रहने का संकल्प किया। 

उदाहरण:

मनुष्य की बुद्धिमानी की परीक्षा धन कमा लेने में नहीं, उसके सदुपयोग में है। जिन्होंने सही अवसर पर सही ढंग से धन खर्च किया, वे धन्य हो गये। 

१- विश्वामित्र जी को आवश्यकता पड़ गयी, तो राजा हरिश्चन्द्र ने अपना सारा राज्य तो दे ही दिया, स्वयं तथा स्त्री बच्चे को बेचकर भी उसकी पूर्ति की। 

२- भगवान बुद्ध का संदेश समाज तक पहुँचाने के लिये परिव्राजकों के भरण-पोषण के लिये सम्राट अशोक एवं हर्षवर्धन ने सारे राज्य की सम्पत्ति कई बार लगा दी।

३- राष्ट्र हित में महाराणा प्रताप की आवश्यकता पूरी करने के लिए भामाशाह ने घर की एक-एक पाई उन्हें सौप दी। 

४- महात्मा गाँधी के कार्य के लिये जमनालाल बजाज ने अपनी सारी सम्पत्ति अर्पित कर दी। 

वैश्य दम्पति अपने मन में सन्तानोत्पदान की इच्छा अनुभव करने लगे। ऐसी इच्छा मन में उठने पर - 

उन्हें स्वप्न में निर्देश मिला कि वे पुत्र की अपेक्षा पुत्री प्राप्ति की कामना करें, क्योंकि कन्या सौभाग्य और आदर का चिह्न है।  पुत्र से पुत्री का होना श्रेष्ठ है -


उदाहरण:

शास्त्र का वचन है-

१- "दश पुत्र समा कन्या यस्याः शीलवती सुता" अर्थात् सुलक्षिणी कन्या दस पुत्रों के समान होती है। 

२- सावित्री राजा अश्वपति की इकलौती कन्या थी। उसने सांसारिक वैभव सम्पन्न नहीं, गुण एवं चरित्र सम्पन्न युवक सत्यवान से विवाह किया तथा अपने चरित्र बल से यमराज को भी नतमस्तक करके पति को छुड़ा लिया। पिता का भी नाम अमर कर दिया। 

३-सीता से मिलने जब जनक चित्रकूट गये, तब सीता को तापसी के वेष में देखकर गद्गद् हो गये। उनके मुख से निकल पड़ा-बेटी तूने दोनों कुलों का नाम ऊँचाकर दिया । पुत्र एक ही कुल का नाम ऊँचा कर पाता है। 

४-सुकन्या से भूलवश च्यवन ऋषि की आँखे फूट गयी । उसने राजपुत्री होकर भी जीवन भर उनकी सेवा का उत्तरदायित्व संभाल लिया और अपनी साधना और बुद्धिमानी से उन्हें पुन: जवान बना दिया। 

उन्होंने प्राप्त निर्देशानुसार नियमित जीवन क्रम अपनाकर एक सुसंस्कारवान् कन्या को जन्म दिया। 

कन्या कलावती के वयस्क और सुशिक्षित हो जाने पर उन्होंने उसका विवाह एक कुलीन परिवार के गुणवान् युवक के साथ सम्पन्न कर दिया। 

वैश्य ने उस होनहार युवक को अपने पुत्र की तरह मानकर शिक्षित किया। जो वैश्य अपने हित के साथ खरीददार के हितों की भी रक्षा करता है, वही सच्चे अर्थों में व्यापारी कहलाता है। 

साधु वैश्य अपने जामात्र सहित व्यापार तो बढ़ाने लगा, किन्तु अपनी आय का एक अंश सत् कार्यों के लिये दान करते रहने के अपने संकल्प को भूल गया। 

उन दोनों ने बहुत बार पत्नियों द्वारा स्मरण दिलाने पर भी अपनी आय का एक अंश सत्कार्यों में लगाते रहने के संकल्प की उपेक्षा कर दी।  पति को अनुचित कार्य से रोकने के पत्नी के उत्तरदायित्व उदाहरण नीचे दिये गये हैं। 

उदाहरण:

१- रावण बड़ा क्रोधी था तथा उसका भयंकर आतंक सब पर था; किन्तु मन्दोदरी ने उसके हर अनुचित कदम पर उसे सावधान किया तथा रोका। रावण ने उस पर शत्रु की प्रशंसा करने का आक्षेप लगाया, फिर भी वह अविचलित भाव से सत्य का आग्रह करती ही रही। भगवान ने उसकी भावना के कारण स्वयं उसका सम्मान किया। 

२-राजा यशवन्त सिंह एक बार युद्ध से पीठ दिखाकर अपने साथियों को छोड़कर किले में संरक्षण के लिये पहुंच गये। रानी किले की सुरक्षा संभाल रहीं थीं। उन्होंने राजा को पहचानने से इनकार कर दिया। दरवाजा नहीं खोला और कहा “मै यशवन्त सिंह को भली प्रकार जानती हूँ, वे अपने सहयोगियों को छोड़कर अकेले अपनी सुरक्षा के लिये कभी नहीं भाग सकते।" राजा को अपने कर्तव्य का ध्यान आया और वे फिर शत्रु को परास्त करके ही लौटे। 
३- तुलसीदास रत्नावली के मोह में अपनी प्रतिज्ञा का ठीक उपयोग नहीं कर रहे थे। रलावली ने उन्हें समझाया । पर जब न माने, तो ऐसे चुभते हुए वाक्य कहे कि उनके मोह का नशा उतर ही गया, तब प्रतिभा को सही दिशा मिल गयी। 

नियम तो यह है कि मनुष्य अपने गृहस्थ सम्बन्धी उत्तरदायित्वों से निवृत्त होकर वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करे; लेकिन वह साधु वैश्य पैसे के लोभ में अपने जमाई को साथ लेकर व्यापार के लिये चल पड़ा। 

स्वधर्म के त्याग से भगवान रुष्ट होते हैं तथा उनके क्रोध के कारण मनुष्य अनेक प्रकार के दुःखों में फँस जाता है। कर्तव्य भुला देने से साधु वैश्य की सद्बुद्धि क्षीण हो गयी तथा वह लोभवश उचित-अनुचित का विचार किए बिना अनीतिपूर्वक धन कमाने लगा। 

इस अपराध के कारण रत्नसारपुर के सत्यनिष्ठ प्रजाजनों ने उसे राज कर्मचारियों द्वारा बन्दी बनवाकर राजाज्ञा से जेल भिजवा दिया। राज्य में अनीति न पनपे, इसके लिये प्रजाजनों द्वारा अनीति निवारण में सहयोग तथा संघर्ष की आवश्यकता 

उदाहरण:

१- राजा पुरूरवा का पुत्र प्रद्योत राजमद के कारण उचित-अनुचित भूल गया। उसके साथी-मित्र उसका बल पाकर नगर में मनमानी करने लगे। प्रजाजनों ने राजकुमार को समझाने का प्रयास किया। वह न माना तो नगर के वीरों ने राजकुमार के मित्रों को कैद कर लिया। राजकुमार उन्हें छुड़ाने पहुंचे, तो उन्हें भी साथ में लेकर राज दरबार में उपस्थित कर दिया। राजा को पुत्र की धृष्टता पर क्रोध आया, उसे दो वर्ष के लिये राज्य से निष्कासित कर दिया तथा सिद्धान्तनिष्ठ नागरिकों को पारितोषिक देकर अभिनन्दित किया। 

२- उज्जयिनी का श्रेष्ठ "गोपद" अनीति से धन कमाने लगा । नागरिकों ने राज्याधिकारियों से शिकायत की, तो गोपद के विरुद्ध प्रमाण नहीं पा सके। प्रजाजनों को पता लगा कि गोपद अपने नौकरों को धन का लालच देकर अनीति के प्रमाण दबा देता है। वह बात श्रेष्ठ "विपुल" को बतायी गयी। उन्होंने गोपद के सेवकों को अधिक धन देकर सारे प्रमाण खुलवा दिये और फिन उन लालची सेवकों को भी दण्डित करा दिया। 

३- राजा कुम्भवर्मा को शराब की लत पड़ गयी। धीरे-धीरे उनमें और भी दोष पनप गये। राजा स्वभाव से चिड़चिड़ा तथा चापलूसी पसन्द हो गया। इस दोष के कारण निष्पक्ष न्याय सम्भव न रहा और राज्य में अनीति- आचरण बढ़ने लगे। जनता को चिन्ता हुई और सबने मिलकर मन्त्रिपरिषद् को उनके उत्तरदायित्व का स्मरण दिलाया। प्रधानमंत्री ने राजा को वस्तुस्थिति बतायी और मन्त्रि-परिषद् ने व्यवस्था संभाल ली। राजा लाल-पीले हुए, पर जन समर्थन के आगे कुछ चल न सकी। युवराज शम्भुवर्मा को गुरुकुल का समय पूरा होते ही बुलाकर उन्हें अभिषेक करा दिया गया । कुम्भवर्मा के लिये राज्य से दूर सामान्य नागरिक की तरह जीवनयापन की व्यवस्था कर दी गयी। 

उसकी धर्मपत्नी ने भी पति से धर्म पालन कराने के अपने कर्तव्य को पूरा नहीं किया, इससे वह भी भगवान सत्यनारायण के क्रोध का भाजन बनी। 

इससे उनके घर की सारी संचित धनराशि विलीन हो गयी। इस प्रकार कष्ट पाने से वह साधु नामक वैश्य और उसकी पत्नी ने अपने मन में समझ लिया कि हमारी यह दुरवस्था धर्म-कर्तव्य से विमुख हो जाने के कारण ही हुई है 

साधु वैश्य ने राजा चन्द्रकेतु से अपनी भूल की क्षमा माँगी और सदाचार की मर्यादा में रहकर व्यापार करने का आश्वासन दिया। 

राजा चन्द्रकेतु ने कहा - जब विभूतिवान् धनी व्यक्ति अनीति का मार्ग पकड़ लेते हैं, तो जन सामान्य द्वारा भी वही राह अपना ली जाती है और समाज भ्रष्ट हो जाता है।  हे वैश्य ! तुमने जो अनीतिपूर्वक धन कमाया है, उसको छोड़कर अपनी मूल सम्पत्ति से तुम पुनः व्यापार प्रारम्भ कर सकते हो। 

वैश्य ने राजा के कथनानुसार पुन: सत्यव्रती बनकर व्यापार किया तथा भगवान सत्यनारायण की कृपा से विपुल धन अर्जित कर लिया। 

उधर लीलावती और कलावती ने भी अपनी भूल समझी और उन्होंने पहले वाला विलासिता से भरा जीवन क्रम छोड़कर कर्मठता एवं सेवा-सद्भावना को जीवन में प्रधानता दी। भगवान सत्यनारायण की कृपा हुई और उनका अधिकांश धन पुनः प्राप्त हो गया । उनका समय पुनः सुख से बीतने लगा।

उदाहरण: 

सादगी मनुष्यता का गौरव है। जितने भी संत और महापुरुष हुए, वे सब सादगी से रहते थे। विलासिता बौद्धिक बचकानेपन अथवा हृदयहीनता की प्रतीक है। 

१- बुद्ध से एक नागरिक ने पूछा "भगवन आपके अनुयायियों में शारीरिक साज-सज्जा की आकांक्षा क्यों नहीं उठती? तथागत बोले हे श्रेष्ठ, जब अत:करण सजा लिया जाता है, तो शरीर की सजावट निरर्थक लगने लगती है। शरीर पर तो निर्वाह मात्र के लिये जितना आवश्यक है, उतना ही ध्यान जाता है। 

२- रघुनाथ शास्त्री को राजा देवसिंह बहुत मानते थे। एक बार महारानी ने उनकी धर्मपत्नी को राजमहल बुलाया। वहाँ उन्हें कीमती वस्त्राभूषण पहनाकर पालकी में बिठाकर भेजा । शास्त्री जी ने उन्हें देख कर कहारों से कहा "आप गलत जगह आ गये। " और द्वार बन्द कर लिया। उनकी पत्नी वापिस राजमहल गयीं । वहाँ सादा धोती पहनकर पैदल ही घर लौटीं, तो शास्त्री जी ने द्वार खोल दिया। कहा "देवी हम आभूषण के आर्कषण में पड़ जायेंगे, तो जन साधारण का क्या होगा?" 

३- एक सम्पन्न बुढ़िया को यमदूत ले गये। उसे स्वर्ग का अधिकारी माना गया, पर उसने एक वर्ष का समय यह कहकर माँगा कि मुझे अभी बहुत कुछ करना है। एक वर्ष तक वह शान-शौकत से रही। समय पर यमदूत उसे पुनः ले गये, पर अब उसे स्वर्ग का अधिकारी नहीं माना गया । बताया गया कि उसने पिछली अवधि में सादगी से रहकर जो पुण्य कमाया था, वह एक वर्ष विलासितापूर्ण जीवन के कारण समाप्त हो गया । 

सत्यसाधक सम्पत्ति को ईश्वर की धरोहर मानकर उसे व्यसन-विलास में नहीं, सत्कायों में खर्च करते और भगवान के प्रेम के अधिकारी बनते हैं। 

इति श्री सत्यनारायण व्रत कथायां तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥


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